लेबनान से इजरायली सेना की वापसी और हिज्बुल्लाह पर रोम का वो फैसला जिसे समझना जरूरी है

लेबनान से इजरायली सेना की वापसी और हिज्बुल्लाह पर रोम का वो फैसला जिसे समझना जरूरी है

क्या लेबनान-इजरायल सीमा पर आखिरकार बारूद का धुआं साफ होने वाला है? या फिर यह सिर्फ एक और अस्थायी युद्धविराम है जो किसी बड़े तूफान से पहले की शांति है? रोम में हुई हालिया राजनयिक बैठक के बाद ये सवाल हर किसी के जेहन में तैर रहे हैं। इस बैठक में लेबनान के दो खास इलाकों से इजरायली सेना को पीछे हटाने और हिज्बुल्लाह की भूमिका को लेकर एक महत्वपूर्ण सहमति बनने की खबर आई है। लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी इतनी सीधी नहीं है जितनी दिखाई देती है।

इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक सैन्य कदम के रूप में देखना बड़ी भूल होगी। यह असल में मध्य पूर्व के उस उलझे हुए राजनीतिक बिसात का हिस्सा है जहां हर मोहरा बहुत सोच-समझकर चला जाता है। इजरायल का पीछे हटना और हिज्बुल्लाह पर नया अंतरराष्ट्रीय दबाव इस क्षेत्र के भविष्य को एक नया मोड़ दे सकता है।

रोम बैठक में क्या तय हुआ और क्यों यह महत्वपूर्ण है

इटली की राजधानी रोम लंबे समय से वैश्विक कूटनीति का केंद्र रही है। इस बार भी वहां कुछ ऐसा ही हुआ। अमेरिका, फ्रांस, इटली और लेबनान के प्रतिनिधियों के बीच बंद कमरों में लंबी बातचीत हुई। इस चर्चा का मुख्य एजेंडा सिर्फ एक ही था कि किसी भी तरह लेबनान की दक्षिणी सीमा पर जारी भारी तबाही को रोका जाए।

इस बैठक का सबसे बड़ा नतीजा यह निकला कि इजरायल दक्षिणी लेबनान के दो प्रमुख रणनीतिक क्षेत्रों से अपनी सेना को पीछे हटाने के लिए तैयार हो गया है। यह कोई मामूली रियायत नहीं है। इजरायली सेना पिछले कई हफ्तों से इन इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत कर रही थी। लेकिन इसके बदले में इजरायल ने भी अपनी कुछ सख्त शर्तें सामने रखी हैं।

इस सहमति का सीधा संबंध उस सुरक्षा गारंटी से है जो इजरायल अपने उत्तरी नागरिकों के लिए चाहता है। जब तक सीमा सुरक्षित नहीं होगी, तब तक इजरायल के विस्थापित नागरिक अपने घरों को नहीं लौट सकते। रोम में इस बात पर सहमति बनी है कि इन खाली होने वाले इलाकों में लेबनानी सेना (LAF) और संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना (UNIFIL) की तैनाती को मजबूत किया जाएगा।

उन दो इलाकों की हकीकत जहां से इजरायली सेना हटने वाली है

जिन दो इलाकों से इजरायली सेना के पीछे हटने की बात चल रही है, वे सैन्य दृष्टि से बेहद संवेदनशील हैं। ये इलाके सिर्फ जमीन के टुकड़े नहीं हैं, बल्कि ये वो प्रवेश द्वार हैं जहां से हिज्बुल्लाह इजरायल के उत्तरी शहरों पर सीधे हमले करता रहा है।

इन इलाकों की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां से पूरे उत्तरी इजरायल पर नजर रखी जा सकती है। इजरायल ने जब जमीनी कार्रवाई शुरू की थी, तो उसका मुख्य लक्ष्य इन्हीं ठिकानों को तबाह करना था। अब वहां से पीछे हटने का मतलब यह है कि इजरायल को अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कुछ ठोस आश्वासन मिले हैं।

लेकिन जमीन पर स्थिति को बदलना इतना आसान नहीं है। इन दोनों क्षेत्रों में सालों से हिज्बुल्लाह ने सुरंगों और हथियारों के बंकरों का एक बड़ा नेटवर्क तैयार कर रखा है। भले ही इजरायली सेना वहां से हट जाए, लेकिन क्या लेबनान की कमजोर सेना इन इलाकों पर पूरी तरह अपना नियंत्रण स्थापित कर पाएगी? यह एक बड़ा सवाल है जिसका जवाब अभी किसी के पास नहीं है।

हिज्बुल्लाह और लितानी नदी का असली गणित

रोम समझौते की सबसे बड़ी शर्त हिज्बुल्लाह की स्थिति को लेकर है। इस सहमति के तहत हिज्बुल्लाह को लितानी नदी के उत्तर में जाना होगा। यह नदी इजरायल-लेबनान सीमा से लगभग 30 किलोमीटर दूर है।

यह कोई नया नियम नहीं है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1701 में भी यही बात कही गई थी। लेकिन सच यह है कि इस नियम का कभी पालन नहीं हुआ। हिज्बुल्लाह के लड़ाके और उनके आधुनिक रॉकेट हमेशा इस सीमा के बिल्कुल करीब तैनात रहे।

इस बार दबाव अलग है। लेबनान की आर्थिक स्थिति पूरी तरह चरमरा चुकी है। वहां के आम लोग अब और जंग बर्दाश्त करने की हालत में नहीं हैं। रोम में बनी सहमति के अनुसार, यदि हिज्बुल्लाह लितानी नदी के पीछे नहीं हटता है, तो लेबनान को मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय मदद पूरी तरह रुक सकती है। यह हिज्बुल्लाह के लिए भी एक बड़ी चुनौती है क्योंकि वह लेबनान के भीतर अपनी बची-खुची राजनीतिक साख को पूरी तरह खोना नहीं चाहेगा।

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यूएन सुरक्षा परिषद का प्रस्ताव 1701 और जमीन पर इसके लागू होने की चुनौतियां

साल 2006 के युद्ध के बाद प्रस्ताव 1701 लाया गया था। इसका मकसद दक्षिणी लेबनान को पूरी तरह से हथियारों से मुक्त क्षेत्र बनाना था, जहां सिर्फ लेबनानी सेना और यूएन की सेना ही रह सके। लेकिन पिछले दो दशकों में यह प्रस्ताव सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहा।

जमीन पर इसे लागू करने में कई व्यावहारिक दिक्कतें हैं:

  • कमजोर लेबनानी सेना: लेबनान की राष्ट्रीय सेना के पास न तो आधुनिक हथियार हैं और न ही हिज्बुल्लाह से सीधे टकराने की ताकत।
  • यूएनआईएफआईएल की सीमित शक्तियां: संयुक्त राष्ट्र के शांति सैनिकों के पास बल प्रयोग करने का अधिकार बहुत सीमित है। वे हिज्बुल्लाह के हथियारों को जबरन जब्त नहीं कर सकते।
  • ईरान का सीधा दखल: हिज्बुल्लाह को मिलने वाली वित्तीय और सैन्य मदद सीधे तेहरान से आती है। जब तक ईरान इस खेल से पीछे नहीं हटता, तब तक कोई भी स्थानीय समझौता टिकाऊ नहीं हो सकता।

इन चुनौतियों को देखते हुए यह समझना मुश्किल नहीं है कि रोम में बनी सहमति को जमीन पर उतारना कितना टेढ़ा काम है। इजरायल इस बार बहुत सतर्क है। वह सिर्फ बयानों पर भरोसा नहीं करने वाला।

क्या इस बार का समझौता वाकई शांति ला पाएगा

इतिहास हमें सिखाता है कि मध्य पूर्व में समझौतों की उम्र बहुत कम होती है। कई बार शांति समझौते सिर्फ नई जंग की तैयारी के लिए वक्त खरीदने का जरिया बनते हैं।

इस बार भी खतरा टला नहीं है। अगर हिज्बुल्लाह के कुछ लड़ाके भी सीमा के पास छिपे रह जाते हैं और इजरायल पर कोई हमला होता है, तो यह पूरा समझौता ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा। इजरायल ने साफ कर दिया है कि अगर उसकी सुरक्षा से कोई समझौता हुआ, तो वह दोबारा और अधिक ताकत के साथ इन इलाकों में घुसेगा।

रोम में बनी सहमति एक अच्छी शुरुआत जरूर है, लेकिन इसे अंतिम जीत मानना जल्दबाजी होगी। आने वाले कुछ हफ्ते बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं। हमें यह देखना होगा कि क्या लेबनानी सेना वाकई इन इलाकों में अपनी संप्रभुता स्थापित कर पाती है, या फिर यह इलाका दोबारा से हिज्बुल्लाह के प्रभाव में चला जाता है।

अगर आप इस क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, तो आपको केवल सेनाओं के पीछे हटने पर नजर नहीं रखनी चाहिए। असली परीक्षा तब होगी जब इन खाली हुए क्षेत्रों में लेबनान के सरकारी विभाग अपनी प्रशासनिक पकड़ मजबूत करना शुरू करेंगे। बिना मजबूत स्थानीय प्रशासन के, इस सीमा पर कभी भी स्थायी शांति नहीं आ सकती।

IB

Isabella Brooks

As a veteran correspondent, Isabella Brooks has reported from across the globe, bringing firsthand perspectives to international stories and local issues.