चीन और ईरान का साथ ड्रैगन को कितना महंगा पड़ेगा

चीन और ईरान का साथ ड्रैगन को कितना महंगा पड़ेगा

चीन की विदेश नीति इस वक्त एक अजीब दोराहे पर खड़ी है। एक तरफ वो ईरान के साथ अपनी "पुरानी और गहरी दोस्ती" का दम भरता है, तो दूसरी तरफ खाड़ी देशों यानी गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल (GCC) में लगा उसका $270 अरब का भारी-भरकम निवेश है। ये कोई छोटा आंकड़ा नहीं है। ये वो पैसा है जो चीन की अर्थव्यवस्था की रगों में दौड़ते खून जैसा है। बीजिंग के लिए मुश्किल ये है कि वो ईरान को छोड़ नहीं सकता और अरब देशों को नाराज करना उसे वहन नहीं होगा। ये संतुलन बनाना अब ड्रैगन के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है।

ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने शी जिनपिंग की रातों की नींद उड़ा दी है। चीन को लगता था कि वो मध्य पूर्व में शांतिदूत बनकर उभरेगा, जैसा कि उसने सऊदी अरब और ईरान के बीच समझौता कराकर दिखाया भी था। लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली। जब मिसाइलें चलने लगती हैं, तो कूटनीति के मेज पर सजाए गए फूल मुरझा जाते हैं। चीन का असल डर ये है कि अगर ईरान के साथ उसके रिश्ते ज्यादा गहरे हुए, तो सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देश उसे शक की नजर से देखेंगे। ये वही देश हैं जहां चीन ने अपनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत अरबों डॉलर झोंक रखे हैं।

चीन का अरबों का दांव और खतरे में पड़ती इकोनॉमी

खाड़ी देशों में चीन का $270 अरब का निवेश सिर्फ इमारतों या सड़कों में नहीं है। इसमें एनर्जी सेक्टर, पोर्ट्स और टेक्नोलॉजी के बड़े प्रोजेक्ट्स शामिल हैं। चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से पूरा करता है। सऊदी अरब चीन का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है। अब सोचिए, अगर ईरान की वजह से इस पूरे इलाके में अस्थिरता बढ़ती है, तो चीन के इन निवेशों का क्या होगा?

बीजिंग को अच्छी तरह पता है कि ईरान एक "पैरिया स्टेट" (अछूत देश) बनता जा रहा है। पश्चिमी प्रतिबंधों ने ईरान की कमर तोड़ रखी है। ऐसे में ईरान के पास चीन के अलावा कोई बड़ा सहारा नहीं बचा। चीन ने ईरान के साथ 25 साल का एक बड़ा समझौता किया है, जिसमें वो करीब $400 अरब के निवेश का वादा कर चुका है। लेकिन ये वादा कागजों पर ज्यादा और जमीन पर कम दिखता है। चीन ने अभी तक ईरान में उस रफ्तार से पैसा नहीं लगाया है जिसकी उम्मीद तेहरान कर रहा था। क्यों? क्योंकि चीन को डर है कि उसके बैंकों और कंपनियों पर अमेरिकी प्रतिबंध न लग जाएं।

ईरान को लगता है कि चीन उसका सबसे बड़ा रक्षक है, लेकिन चीन केवल अपने फायदे का सगा है। वो ईरान का इस्तेमाल अमेरिका को उलझाए रखने के लिए एक मोहरे की तरह करता है। ड्रैगन की चाल सीधी है: ईरान को इतना जिंदा रखो कि वो अमेरिका के लिए सिरदर्द बना रहे, लेकिन उसे इतना मजबूत मत होने दो कि वो अरब देशों के साथ चीन के रिश्तों को ही तबाह कर दे। ये एक बहुत ही खतरनाक खेल है जिसमें ड्रैगन खुद भी फंस सकता है।

खाड़ी देशों की नाराजगी का बढ़ता ग्राफ

सऊदी अरब और यूएई अब पहले वाले देश नहीं रहे जो चुपचाप सब सह लें। वो अपनी सुरक्षा और हितों को लेकर बेहद संजीदा हैं। जब चीन ने पिछले साल ईरान के साथ अपनी नजदीकी बढ़ाने की कोशिश की, तो खाड़ी देशों ने साफ संकेत दिया कि वो इसे पसंद नहीं कर रहे। खाड़ी के देशों के पास पैसे की कमी नहीं है, और अब उनके पास विकल्प भी हैं। वो भारत, यूरोप और वापस अमेरिका की तरफ देख सकते हैं।

चीन के लिए सबसे बड़ी चुनौती ये है कि वो खुद को एक निष्पक्ष खिलाड़ी के रूप में पेश करना चाहता है। लेकिन जब ईरान की समर्थित ताकतें जैसे हूती विद्रोही लाल सागर (Red Sea) में जहाजों पर हमले करते हैं, तो चीन की बोलती बंद हो जाती है। इन हमलों से चीन का अपना व्यापार प्रभावित हो रहा है। उसके मालवाहक जहाजों को लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है, जिससे लागत बढ़ रही है। ये ड्रैगन के लिए "अपने ही बिछाए जाल में फंसने" जैसी स्थिति है।

ईरान चाहता है कि चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उसका खुलकर बचाव करे और उसे सैन्य तकनीक दे। चीन ने कुछ हद तक मदद की भी है, लेकिन वो कभी भी खुलकर सामने नहीं आता। वो हमेशा पर्दे के पीछे से खेलता है। उसे पता है कि जिस दिन उसने ईरान का हाथ मजबूती से थाम लिया, उस दिन रियाद और अबू धाबी में उसके लिए दरवाजे बंद हो सकते हैं। और $270 अरब की पूंजी को दांव पर लगाना कोई समझदारी का काम नहीं है।

ड्रैगन की अगली चाल और मजबूरी

अब सवाल ये है कि चीन करेगा क्या? वो अपनी पुरानी नीति 'Wait and Watch' पर ही टिका रहेगा। वो ईरान को मीठी बातें कहेगा, तेल खरीदेगा (वो भी भारी डिस्काउंट पर), लेकिन बड़ी सैन्य मदद देने से बचेगा। साथ ही, वो सऊदी अरब को ये यकीन दिलाने की कोशिश करेगा कि ईरान पर उसका प्रभाव क्षेत्र में शांति लाने के काम आएगा।

लेकिन ये खेल अब ज्यादा दिनों तक चलने वाला नहीं है। मध्य पूर्व की आग अब चीन की दहलीज तक पहुंच रही है। अगर ईरान और इजरायल के बीच सीधी जंग छिड़ती है, तो चीन को एक पक्ष चुनना ही पड़ेगा। और सच तो ये है कि चीन हमेशा पैसे और ताकत के साथ खड़ा होता है। उसके लिए खाड़ी का बाजार और वहां का निवेश ईरान की दोस्ती से कहीं ज्यादा कीमती है। ईरान चीन के लिए केवल एक रणनीतिक कार्ड है, जबकि खाड़ी देश उसकी अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन हैं।

चीन के पास अब विकल्प सीमित हैं। वो अपनी छवि को सुधारने के लिए छोटे-मोटे समझौते करा सकता है, लेकिन किसी बड़े संकट को टालने की ताकत उसके पास नहीं है। उसका पूरा ध्यान इस बात पर है कि कैसे बिना किसी बड़े टकराव के वो अपना $270 अरब सुरक्षित रखे। लेकिन युद्ध की स्थिति में निवेश सुरक्षित नहीं रहते, ये बात ड्रैगन को भी समझ लेनी चाहिए।

अगर आप इस स्थिति को करीब से देख रहे हैं, तो साफ है कि चीन की डिप्लोमेसी की असली परीक्षा अब शुरू हुई है। बीजिंग की हर चाल पर नजर रखनी होगी क्योंकि वो जो कहता है, अक्सर उससे ठीक उलट करता है। खाड़ी देशों में लगा उसका पैसा ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन चुका है। ईरान के साथ खड़ा दिखना उसकी मजबूरी हो सकती है, पर अरब देशों को खोना उसकी सबसे बड़ी हार होगी।

अब देखना ये है कि ईरान अपनी उम्मीदों के टूटने पर क्या प्रतिक्रिया देता है। क्या वो चीन को ब्लैकमेल करेगा? या चीन उसे चुप रखने के लिए कुछ और अरब डॉलर फेंक देगा? जो भी हो, मध्य पूर्व की इस बिसात पर चीन अब केवल एक खिलाड़ी नहीं, बल्कि एक डरा हुआ निवेशक भी है। आने वाले समय में चीन ईरान से थोड़ी दूरी बना सकता है, ताकि खाड़ी में उसका कारोबार बिना किसी बाधा के चलता रहे। व्यापार के लिए कूटनीति की बलि देना चीन के पुराने पैंतरों में से एक है।

LA

Liam Anderson

Liam Anderson is a seasoned journalist with over a decade of experience covering breaking news and in-depth features. Known for sharp analysis and compelling storytelling.